Essai sur les théories de la distribution | Hindi | Prix ​​Facteur | Économie

Voici un essai sur les «théories de la distribution» pour les classes 9, 10, 11 et 12. Trouvez des paragraphes, des essais longs et courts sur les «théories de la distribution» spécialement écrites pour les étudiants des écoles et des collèges en langue hindi.

Essai n ° 1. वितरण का प्रतिष्ठित सिद्धान्त (Théorie classique de la distribution):

Théorie de la théorie générale, théorie de la théorie générale, théorie de la théorie générale '' लाभ 'पृथक्-किया है है

की क्रमशः।। उत्पत्ति।

अनुसार है। अनुसार श्रेष्ठ अथवा अधिसीमान्त (intramarginal) inal सीमान्त

के।

मजदूरी।।

दोष ( Démérites):

(a) वितरण कर पाये पाये।

(b) विचारधाराएँ हैं।

Essai n ° 2. वितरण का सीमान्त सिद्धान्त (Théorie de la productivité marginale de la distribution):

सीमान्त है। सिद्धान्त

सिद्धान्त का प्रतिपादन 19 वीं शताब्दी के अन्त में जे. बी. (JB Clark), (Walras), (Wickstead) अर्थशास्त्रियों द्वारा किया गया। श्रीमती श्रीमती श्रीमती - श्रीमती जॉन Mrs. (Mme Joan Robinson) Joan जे. आर. (JR Hicks) जाता है।

का कथन (Clark's Version)

ब्लॉग (Mark Blaug) शब्दों में ”

प्रकार जे. बी. अनुसार, दीर्घकाल है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ ( hypothèses de la théorie):

सीमान्त पर आधारित है:

(1) प्रतियोगिता (compétition parfaite):

साधन हैं।

(2) की समरूप इकाइयाँ (unité homogène de facteurs):

सभी इकाइयाँ तथा परस्पर पूर्ण Sub (substituts parfaits) हैं।

(3) लाभ प्राप्ति (Pour obtenir un profit maximum):

अधिकतम है। MRP (MRP) (MW)

(4) ह्रास नियम की क्रियाशीलता (Opérations de la loi des rendements décroissants):

इस

(5) (Long terme):

केवल

(6) रोजगार (plein emploi):

पूर्ण आधारित है।

उत्पादकता की धारणाएँ ( Concepts de productivité):

के सकता है:

(a) उत्पादकता (productivité physique)

(b) उत्पादकता (Productivité des revenus)

Nombre d'unités physiques (Unités physiques) भौतिक

A. भौतिक उत्पादकता (productivité physique moyenne - APP):

साधन की औसत उत्पादकता (Productivité moyenne) जाना जाता है।।

जानते हैं कि ,

B. सीमान्त भौतिक उत्पादकता (productivité physique marginale - MPP):

La productivité marginale (TP) La productivité marginale (productivité marginale)

में (MPP) MP। MPP (MPP)

C. आगम उत्पादकता (Productivité moyenne des revenus - ARP):

आगम उत्पादकता (ARP) सकता है है:

ARP = APP × AR

आगम उत्पादकता = औसत × आगम अथवा कीमत

में,, उत्पादकता (औसत)

D. आगम उत्पादकता (Productivité marginale des revenus - MRP):

के (MRP) MR

MRP ( MRP) जा सकती है है:

MRP = MPP × MR

उत्पादकता = सीमान्त उत्पादकता × आगम

में,, ।

E. सीमान्त उत्पादकता का मूल्य (valeur de la productivité marginale - VMP):

VMP = MPP × AR

का = सीमान्त × कीमत (औसत आगम)

उत्पादकता का, है।

की व्याख्या - जे. बी. क्लार्क का विचार ( Explication de la théorie - Point de vue de JB Clark ):

प्रो. अनुसार उत्पत्ति

उत्पादक श्रमिकों MP MP MP MP MP (MP L )

मजदूरी की व्याख्या चित्र 1 की गयी है।

OW की प्रचलित दर। लाभ की की OL की

होने में

प्रो. (Static Society) (Static Society) (Static Society)

शब्दों में, श्रम की समग्र पूर्ति (offre globale de travail)) होती है। ढूँढने श्रमिक (श्रम)

में,, । है। माँग

प्रो. का विचार पूर्ण रोजगार (plein emploi) मान्यता पर आधारित है। Bill में कुछ तो तो तो कोष

, है; मध्य बढ़ायेगी। प्रकार,

आलोचना ( critique):

का कारण विभिन्न अर्थशास्त्रियों जिनमें, जिनमें श्रीमती (Mme Robinson) तथा प्रो. (Hobson)), की।

से प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

1. प्रतियोगिता (compétition parfaite):

La compétition parfaite est un mythe | इस है।

( a) Hom की विभिन्न इकाइयों की Hom (homogénéité de différentes unités d'un facteur):

में -

b) उत्पादन साधनों की गतिशीलता (mobilité des facteurs de production):

उत्पादन

2. the की ज्ञात To (isoler la productivité marginale d'un facteur):

प्रक्रिया है। है। में

3. रोजगार (plein emploi):

पूर्ण है।

4. का असमान वितरण (distribution inégale de la richesse):

के अनुसार, । की है। सिद्धान्त है। नैतिक चाहिए।

5. सौदेबाजी की अवहेलना (ignore la négociation collective):

साधन सिद्धान्त है।

6. सिद्धान्त (théorie unilatérale):

प्रो. फ्रेडमैन (Milton Friedman), (Samuelson) की सिद्धान्त है।

Essai n ° 3. वितरण का आधुनिक सिद्धान्त (Théorie moderne de la distribution):

(Marshall), (Hicks), (Friedman) अर्थशास्त्रियों के अनुसार प्रो. प्रतिपादित हिक्स

अनुसार

साधन की माँग ( demande de facteur):

की माँग व्युत्पन्न माँग (demande dérivée) है। MRP (MRP) MRP है। 2 मात्रा है।

की कीमत OP 1 साधन OL 1 माँग है। इसी प्रकार साधन की कीमत OP 2 तथा OP 3 होने पर साधन की क्रमशः OL 2 तथा OL 3 मात्राओं की माँग की जाती है किन्तु कीमत निर्धारण के लिए व्यक्तिगत फर्म द्वारा की जा रही साधन की माँग के स्थान पर हमें उस साधम की सम्पूर्ण उद्योग द्वारा की जा रही माँग को देखना होगा ।

सम्पूर्ण उद्योग की साधन माँग, उद्योग की फर्मों को व्यक्तिगत माँगों का योग होती है । साधन के कुल माँग वक्र की व्युत्पत्ति चित्र 3 में समझायी गयी है । हमने माना कि उद्योग में 100 फर्में हैं ।

OP 1 साधन कीमत पर व्यक्तिगत फर्म की माँग OL 1 है किन्तु इस साधन कीमत पर सम्पूर्ण उद्योग की माँग ON 1 है जो 100.OL 1 के बराबर है क्योंकि उद्योग की फर्मों संख्या 100 है । इसी प्रकार साधन कीमत OP 2 तथा OP 3 पर सम्पूर्ण उद्योग की माँग क्रमशः 100.OL 2 तथा 100.OL 3 होगी ।

उद्योग का माँग वक्र DD बायें से दायें नीचे गिरता हुआ होता है जिसका कारण यह है कि MRP वक्र, जिसके योग से DD वक्र मिलता है, भी एक बिन्दु के बाद बायें से दायें नीचे गिरता हुआ होता है । इसका अभिप्राय है कि घटती हुई सीमान्त उत्पादकता के नियम के अनुसार एक साधन की मात्रा बढ़ाने पर उसकी सीमान्त उत्पादकता घटती है ।

साधन की पूर्ति ( Supply of Factor):

किसी साधन की पूर्ति उसकी अवसर लागत (Opportunity Cost) पर निर्भर करती है । साधन को वर्तमान व्यवसाय में वह न्यूनतम धनराशि अवश्य मिल जानी चाहिए जितनी कि उसे सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग में मिल सकती है अन्यथा वह वर्तमान व्यवसाय को छोड़ देगा ।

साधन की पूर्ति को प्रभावित करने वाले घटक हैं:

(i) साधन का पुरस्कार

(ii) साधन की गतिशीलता

(iii) साधन की शिक्षा एवं प्रशिक्षण लागत

(iv) साधन कुशलता

(v) साधन आवागमन लागत

(vi) साधन की कार्य और आराम में वरीयता

चित्र 4 में साधन का पूर्ति वक्र दिखाया गया है । चित्र में SS साधन का पूर्ति वक्र है । यह वक्र स्पष्ट करता है कि साधन कीमत बढ़ने पर साधन की पूर्ति भी बढ़ती है और साधन कीमत घटने पर साधन पूर्ति भी घटती है ।

जब साधन कीमत OP से बढ़कर OP 1 हो जाती है तब साधन की पूर्ति बढ़कर ON 1 हो जाती है । इसी प्रकार जब साधन कीमत घटकर OP 2 रह जाती है तब साधन की पूर्ति भी घटकर ON 2 रह जाती है ।

साधन कीमत निर्धारण : माँग-पूर्ति सन्तुलन ( Factor Price Determination : Demand Supply Equilibrium):

चित्र 5 में माँग एवं पूर्ति शक्तियों द्वारा साधन की कीमत निर्धारण प्रक्रिया समझायी गयी है । माँग एवं पूर्ति शक्तियाँ परस्पर अन्तर्क्रिया हेतु बिन्दु E पर सन्तुलित होती हैं जहाँ साधन की OP कीमत पर OL माँग की जा रही है । यदि साधन की कीमत OP 1 है, तब इस कीमत पर ab अतिरेक पूर्ति है जो साधन की कीमत को घटाकर OP तक ले आयेगी ।

इसके विपरीत, यदि साधन की कीमत OP 2 है, तब cd अतिरेक माँग है जो साधन कीमत को बढ़ाकर OP तक ले जायेगी । इस प्रकार अन्तिम सन्तुलन की दशा में साधन की OP कीमत निर्धारित होती है ।

साधन बाजार में फर्म का अल्पकालीन सन्तुलन ( Short-Term Equilibrium of Firm in Factor Market):

साधन की कीमत उसकी माँग और पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है । परन्तु यह कीमत साधन की सीमान्त आय उत्पादकता (MRP) के बराबर होती है । इस तथ्य को चित्र 6 में देखा जा सकता है ।

चित्र में साधन OP निर्धारित होती है । उद्योग द्वारा निर्धारित साधन कीमत OP फर्म दिया हुआ मानकर साधन की उतनी मात्राओं का प्रयोग करेगी जिनके लिए उनकी सीमान्त आय उत्पादकता (MRP) साधन कीमत OP के बराबर हो जाए ।

अल्पकाल में फर्म को साधन बाजार में तीनों स्थितियों – असामान्य लाभ (Abnormal Profit), सामान्य लाभ (Normal Profit) तथा हानि (Loss) का सामना करना पड़ सकता है ।

je. असामान्य लाभ (Abnormal Profit):

(देखें चित्र 6) सन्तुलन बिन्दु E पर,

साधन कीमत = सीमान्त आगम उत्पादकता

OP = EN

औसत साधन लागत = EN

औसत आगम उत्पादकता = RN

प्रति इकाई लाभ = RE

कुल लाभ = TREP क्षेत्र

ii. सामान्य लाभ (Normal Profit):

(चित्र 7) सन्तुलन बिन्दु E पर,

औसत साधन लागत = औसत आगम उत्पादकता

AFC = ARP = OP (या EL)

जो सामान्य लाभ को बताती है ।

iii. हानि (Loss):

(चित्र 8) सन्तुलन बिन्दु E पर,

औसत साधन लागत (AFC) = EL

औसत आगम उत्पादकता (ARP) = RL

प्रति इकाई हानि = ER

कुल हानि = PERT क्षेत्र

साधन बाजार में फर्म का दीर्घकालीन सन्तुलन ( Long-Term Equilibrium of Firm in Factor Market):

दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगिता में केवल एक ही सम्भावना है कि फर्म को केवल सामान्य लाभ ही प्राप्त हो । यदि दीर्घकाल में उद्योग की किसी फर्म को असामान्य लाभ मिलता है तो उद्योगों में अन्य फर्में प्रवेश कर जायेंगी जिससे वस्तु की कीमत गिरेगी तथा लागत बढ़ेगी तथा असामान्य लाभ सामान्य लाभ में परिवर्तित हो जायेगी । इसके विपरीत हानि की दशा में कुछ फर्में उद्योग से बाहर चली जायेंगी जिससे हानि सामान्य लाभ में बदल जायेगी ।

अतः फर्म के दीर्घकालीन सन्तुलन की दशा में,

साधन कीमत = ARP = MRP = AFC = MFC

चित्र 9 में साधन बाजार में फर्म के दीर्घकालीन सन्तुलन को दिखाया गया है । चित्र में सामान्य लाभ की स्थिति प्रदर्शित की गयी है ।

क्योंकि, सन्तुलन बिन्दु E पर,

साधन कीमत = AFC = ARP

अर्थात् शून्य लाभ की दशा है ।

संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि उद्योग का पूर्ण सन्तुलन उस बिन्दु पर होगा जहाँ श्रम की औसत उत्पादकता और औसत मजदूरी भी समान हो । यह स्थिति केवल उस दशा में होगी जबकि साधन बाजार और उसके द्वारा उत्पादित वस्तु बाजार दोनों में पूर्ण प्रतियोगिता हो ।

 

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