Essai sur la mondialisation | Hindi | Processus économique | Économie

Voici un essai sur la «mondialisation» pour les classes 9, 10, 11 et 12. Trouvez des paragraphes et des essais longs et courts sur la «mondialisation» spécialement écrits pour les étudiants des écoles et des collèges en langue hindi.

Essai sur la mondialisation


Contenu de l'essai:

  1. वैश्वीकरण का अर्थ (signification de la mondialisation)
  2. की परिभाषाएँ (Définitions de la mondialisation)
  3. की आवश्यकता (Besoins de la mondialisation)
  4. की विशेषताएँ या लक्षण (caractéristiques ou caractéristiques de la mondialisation)
  5. या भूमण्डलीकरण के प्रभाव (Impact de la mondialisation)
  6. से सम्बद्ध कठिनाइयाँ (contraintes de la mondialisation)
  7. के सम्बन्ध में सुझाव (suggestions concernant la mondialisation)


Essai n ° 1. वैश्वीकरण का अर्थ ( signification de la mondialisation):

सम्बन्ध है। अवसरों है। विश्व

से। की, से। वैश्वीकरण है।

अभिप्राय वैश्वीकरण है। में, ।


Essai n ° 2. वैश्वीकरण की परिभाषाएँ ( Définitions de la mondialisation):

विभिन्न किया है:

une. लेन्जे के अनुसार ”” ”

b. प्रो. नैय्यर के अनुसार ”” ”

c. प्रो. एन. के शब्दों में ”” ”

ré. एवं पोर्टसिया ”” ” विश्व बाजार है ”

से वैश्वीकरण वैश्वीकरण के लिए व्यक्तियों,,, ज्ञान हो सक । को सार्वभौमीकरण, जाता जाता है है ”


Essai n ° 3. Need की आवश्यकता ( Besoins de la mondialisation):

आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है:

(1) एवं, विश्व।

(2) तीव्र गयी।

(3) एककी

(4) के विभिन्न

(5) नीति के अन्तर्गत 34 को सम्मिलित किया गया। औद्योगिक नीति के अन्तर्गत उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में 51% तक के विदेशी पूँजी विनियोग को अनुमति प्रदान की गयी.

(6) की नीति कोयला कोयला

(7) में

(8) नियमन गया।

(9) वर्तमान

(10), ओनिडा, एवं बी. पी. एल. कम्पनियाँ, जापान,

(11) Plus de 12% de réduction de 25% sur le total de la charge.

(12) को गयीं। को है।

(13) कोऑपरेटिव लि. के


Essai n ° 4. की विशेषताएँ या ( caractéristiques ou caractéristiques de la mondialisation):

प्रमुख निम्नलिखित हैं:

je., पर किये

ii. संगठनों है।

iii. राष्ट्र, कोषों

iv. अन्तर्राष्ट्रीय

v. है। अन्तर्गत

vi. श्रम

vii. परिणामस्वरूप धीरे, जिससे जिससे जिससे जिससे

viii. प्रतिफल .


Essai n ° 5 . या भूमण्डलीकरण के प्रभाव ( Impact de la mondialisation):

भिन्न है। का। एक है। है। हम भिन्न।

भी, के कोष,, । से

, सकते हैं:

1. चेतना का विकास ( développement de la conscience sociale):

प्रचार है। का रहे हैं। स्तर शैली उन्नत है। की

की हैं। को वे ने ऐसी, वे, जो।

को हैं। द्वारा व्यवसाय।

2. परिवर्तन (changements technologiques):

बहुत हैं। प्रतिदिन नये नये रही हैं। है। इतना। एवं हैं। है।

3. का वैश्विक स्वरूप (forme globale de l'entreprise):

स्वभाव है। में जाता है। वहीं है। की हैं। जो, आयात।

में बहुराष्ट्रीय। प्रकार, है।


Essai n ° 6 . से सम्बद्ध कठिनाइयाँ ( contraintes de la mondialisation):

राह हैं:

1. प्रतिस्पर्द्धा ( Compétition inégale):

असमान है। प्रतिस्पर्द्धा है शक्तिशाली (में) छोटे भारतीय।

की Intégrer une souris dans un troupeau d'éléphants

नय्यर निम्नलिखित निम्नलिखित हैं:

(a) उद्यम '' हैं।।

(b) के।।

(c) 1991 पूर्व चार

(d) उत्पादित।।

(e) अभी हैं हैं।

(f) में।। में; Garantie de contrepartie

2. में बढ़ता हुआ संरक्षणवाद (protectionnisme croissant à l'étranger):

के, हैं। में

के लिए :

(a) भारतीय स्कर्ट संयुक्त

b) ही में यूरोपीय संघ (Union européenne) के

c) Les normes du travail, les normes du travail, les normes du travail

3. व्यापार गुटों की स्थापना (formation de blocs commerciaux régionaux):

आधारभूत कुंजी मानते हैं। इस समय 15 से अधिक व्यापारिक गुट बने हुए हैं । इन गुटों की स्थापना से स्वतन्त्र प्रतियोगिता की प्रक्रिया बन्द हो जाती है ।

4. तकनीकी उन्नति को बढ़ावा देने की आवश्यकता (Need to Stimulate Technical Progress):

वैश्वीकरण के लिए आवश्यक है कि विकसित देश पूर्ण संकल्प और निष्ठा के साथ विकासशील देशों में प्रयोग आने वाली उत्पादन तकनीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लायें, ताकि वैश्वीकरण का लाभ विकासशील देशों को भी मिले तथा वैश्वीकरण की नीति टिकाऊ हो सके ।

5. सीमित वित्तीय साधन (Limited Financial Resources):

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तु प्रतियोगिता कर सके, इसके लिए वस्तु की किस्म में सुधार व उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होगी परन्तु विकासशील देशों में पूँजी का अभाव है । फलतः इन देशों को वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए विश्व बैंक व मुद्रा कोष आदि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के पास जाना पड़ता है जो अनुचित शर्तों पर वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं ।

6. अनुचित क्षेत्र में प्रवेश (Entry in Unwanted Area):

वैश्वीकरण नीति के तहत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रवेश अधिकाधिक उपभोक्ता क्षेत्र और सेवा क्षेत्र में हो रहा है जो उचित नहीं है । आर्थिक ससंचना के विनियोग पर 16 से 18% की प्रत्याय दर गारण्टी का आश्वासन भी अनुचित है । इसी प्रकार बीमा क्षेत्र को विदेशी कम्पनियों के लिए खोलने का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि भारतीय बचत और भी कम होगी ।

7. अन्य समस्याएँ (Other Problems):

(a) उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता:

देश की अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार पूर्ण रूप से नहीं हो सके हैं क्योंकि जिन देशों ने वैश्वीकरण को अपनाया है, उन्होंने अपने यहाँ पूर्व में ही उसके लिए वातावरण तैयार किया है, साथ ही हमारे देश की स्वतन्त्र बाजार की दिशा में गति भी धीमी रही है ।

( b) प्रतिकूल स्थिति:

अमेरिका भारत पर 'स्पेशल 301' व 'बौद्धिक सम्पदा' अधिकार सम्बन्धी अवधारणा को स्वीकार करने के लिए दबाव डाल रहा है । ऐसी स्थिति में यदि हम वैश्वीकरण को स्वीकार करते हैं तो हमारी अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों चली जायेगी तथा यदि अस्वीकार करते हैं तो भारत को वैश्वीकरण में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा ।

( c) श्रमिकों में भय:

भारतीय श्रमिकों का मानना है कि देश में आधुनिक मशीनों की स्थापना से कम श्रमिकों की आवश्यकता होगी, साथ ही कारखानों में छँटनी होगी तथा वे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे ।


Essay # 7 . वैश्वीकरण के सम्बन्ध में सुझाव ( Suggestions Regarding Globalization):

भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए कुछ प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं:

I. भारतीय उत्पादकों की प्रतिस्पर्द्धा क्षमता में सुधार (Improvement in Competitiveness of Indian Producers):

विश्व बाजार में सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपनी प्रतिस्पर्द्धा क्षमता में सुधार लाना चाहिए ।

प्रतिस्पर्द्धा क्षमता में सुधार के लिए आवश्यक है:

(a) उत्पादकता में तीव्र वृद्धि

(b) वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार

(c) विकसित उत्पादन तकनीकों का विकास

(d) भारतीय कम्पनियों की संगठनात्मक पुनर्रचना |

यह उल्लेखनीय है कि कम्पनी की कुशलता की कसौटी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली कम्पनियों की कार्यकुशलता एवं उत्पादकता को मानना चाहिए और उस स्तर को प्राप्त करने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए ।

II. MNC s से गठबन्धन (Alliance with MNC s ):

भारत में बड़ी संख्या में MNC s का प्रवेश हो रहा है । MNC s के पास अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय क्षमता, व्यापारिक अनुभव और कुशलता है । अतः MNC s और घरेलू कम्पनियों के परस्पर हित में है कि वे आपसी गठबन्धन में बँधे ।

III. तकनीक में आत्मनिर्भरता (Self-Sufficiency in Technology):

विश्वव्यापीकरण का लाभ भारत जैसे विकासशील देशों को तभी प्राप्त होगा जब वे अद्यतन तकनीक का उपयोग करेंगे ।

IV अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षणवाद से मुकाबला (Facing International Protectionism):

अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षणवाद से निपटने के लिए एक ओर तो हमें घरेलू उपकरणों में विदेशियों की भागीदारी को बढ़ाना होगा, ताकि विदेशी उपक्रमी अपनी सरकारों पर संरक्षण की नीति अपनाने के विरोध में दबाव बनायें और दूसरी ओर, हमें घरेलू ब्राण्डों को विदेशी बाजारों में विकसित करना होगा, ताकि विदेशी क्रेता हमारे ही उत्पाद खरीदने के लिए उत्सुक रहें ।

V. कृषि व लघु क्षेत्र का आधुनिकीकरण (Modernization of Agriculture at Small Sector):

भारत चूँकि एक कृषि-प्रधान देश है, अतः भारतीय अर्थव्यवस्था की विश्वव्यापीकरण प्रक्रिया में भागीदारी तब तक व्यर्थ रहेगी जब तक कृषि एवं लघु क्षेत्र इस प्रयास में योगदान नहीं देता ।

अतः कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए आवश्यक है कि:

(a) कृषि से सम्बद्ध सभी उत्पादन क्रियाओं को जिनमें बीज बोने से कृषि उपज की बिक्री तक के सभी काम शामिल हैं, व्यावसायिक लिबास पहनाना होगा ।

(b) कृषि से सम्बद्ध उपरिढाँचे को विकसित करना होगा ।

(c) कृषि क्षेत्र में शोध एवं विकास के विस्तार की नितान्त आवश्यकता है जिससे कि ऐसे उत्पादों का निर्माण हो सके जो कि अन्तर्राष्ट्रीय गुणवत्ता के स्तर पर खरे उतर सकें ।

अतः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि यद्यपि हमारी अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण की दिशा में चल चुकी है परन्तु इस दिशा में किये गये प्रयासों की सफलता में सन्देह ही है ।

इस समय न तो अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण ही उपयुक्त है और न ही हमारी आन्तरिक आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियाँ ही इसके लिए तैयार हैं – देश इस बात के लिए एकमत बनता जा रहा है कि अन्धाधुन्ध वैश्वीकरण की अपेक्षा चयनात्मक वैश्वीकरण (Selective Globalization) की नीति अपनानी चाहिए ।

वस्तुतः भारत में घरेलू उदारीकरण व बाहरी उदारीकरण की प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलने से कुछ कठिनाइयाँ आने लगी हैं लेकिन प्रयत्न करने पर हम आधुनिकीकरण, मानवीय विकास व सामाजिक न्याय में ताल-मेल बैठाते हुए अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्द्धा व अधिक कार्यकुशल बना सकते हैं ।

अन्य देशों ने पहले घरेलू उदारीकरण को सुदृढ़ किया और अपनी अर्थव्यवस्था को सबल व सक्षम बनाया और बाद में बाहरी उदारीकरण का मार्ग अपनाया । समयाभाव के कारण हमें विश्व की प्रतियोगिता में आगे बढ़ाने के लिए एक साथ दोनों मोर्चों पर कार्य करना होगा ।


 

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