Essai sur les lois du retour | Hindi | Économie

Voici un essai sur les lois du retour spécialement écrit pour les étudiants des écoles et des collèges en langue hindi.

Essai n ° 1. उत्पत्ति वृद्धि नियम (Loi du rendement croissant):

प्रारम्भिक है। के

की परिभाषाएँ ( Définitions de la loi):

(Marshall) अनुसार, ”” तथा साधनों की कुशलता बढ़ है ”

उत्पत्ति धन्धों, उद्योग।

रॉबिन्सन के अनुसार ”” में ”

नियम होने MP MP (MP) AP (AP) बढ़ने हैं.

द्वारा स्पष्टीकरण:

द्वारा स्पष्टीकरण:

को AP MP की 1।।

स्पष्ट जैसे MP किन्तु किन्तु में है।

Law Return का नियम एवं Law ( loi du rendement et des coûts croissants):

दृष्टि से लागत Law Cost -प्रतिफल नियम के

तथा घटती इसलिए इसलिए इसलिए Law

नियम में (AP) तब (MP) तेजी शब्दों में, जब (AC)। (2)

Conditions d'application de la loi de rendement croissant:

नियम निम्नलिखित हैं:

(i) (facteurs fixes):

की हैं। होने करेगी। नियम क्रियाशील है।

ii) साधनों की अविभाज्यता (indivisibilité des facteurs):

के। कुछ को है। उपकरण, हैं।

Utilisation optimale (Utilisation optimale) -परिवर्तनशील स्थिर है।

iii) श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण (division du travail et spécialisation):

विभाजन।

वृद्धि नियम की सीमाएँ ( Limites de la loi du rendement croissant):

(i) का है।। साधन

(ii) स्थिर

(iii) नियम पाता। साधनों। अनुपात

Essai n ° 2. उत्पत्ति समता नियम ( loi du retour constant):

नियम। नियम

नियम की परिभाषा ( définition de la loi):

प्रो. के शब्दों में ”” ”

Combinaison optimale ou idéale (Combinaison optimale ou idéale) के अनुसार जैसे

उत्पत्ति AP (AP) MP MP (phase temporaire)

द्वारा स्पष्टीकरण:

द्वारा स्पष्टीकरण:

3 समता AP और MP को किया गया है। AP और MP बराबर पड़ी (Ligne horizontale) रूप X-।

Of समता नियम एवं लागत ( loi du prix et du retour constant):

नियम 4 किया। है।

Essai n ° 3. Law ह्रास नियम ( loi du rendement décroissant ):

La loi de la proportion variable (loi de la proportion variable)

Trois étapes différentes Law ने इसी को उत्पत्ति Law Law (loi du rendement décroissant) नाम से पुकारा था किन्तु प्रो. गया।

इस

नियम की व्याख्या ( Déclaration de la loi):

प्रो. (Stigler) अनुसार, ""

रॉबिन्सन के अनुसार ”” । ”

प्रो. के अनुसार ”

नियम की व्याख्या ( Explication du droit):

नियम को (TP), (AP) (MP)

लिए TP, AP तथा MP को जाना आवश्यक है है:

je. उत्पादकता (productivité totale ou TP):

साधन, उसे उसे।। मुख्यतः,

, TP = f (TVF)

जहाँ TVF = कुल परिवर्तनशील साधन

ii. उत्पादकता (productivité moyenne ou PA):

विभिन्न उत्पादन स्तरों पर साधन-साधन अनुपात (Rapport entrée-sortie)

iii. उत्पादकता (productivité marginale ou PM):

की एक जबकि

MP n = TP n - TP (n-1)

, MP n = n की सीमान्त उत्पादकता

TP n = n की कुल उत्पादकता

TP (n-1) = (n-1) की कुल उत्पादकता

1 स्पष्टीकरण देती है:

प्रथम अवस्था:

में Util Util Util Util Util Util Util Util Util Util Util Util Util Util आरम्भ, तथा।

में दो हैं। में है। की MP (MP) है। के AP (AP) ही रहती है।

के MP (MP) (AP)))। Point Point Point (Point d'inflexion) हैं।

का (AP)) जाये। Phase de rendement moyen croissant (phase de rendement moyen croissant); niveau de rendement croissant

द्वितीय अवस्था:

में औसत उत्पादन (AP) सीमान्त (MP) घट रहे हैं। का MP MP (MP)) जाती हो है। में कुल उत्पादन) TP MP MP MP तालिका 1।

Stade de décroissance (produit) (étape)

तृतीय अवस्था:

में है।

सीमान्त उत्पादकता (MP) (Négatif) के (TP) लगती है। 1 यह अवस्था गयी है। Stade de retour négatif उत्पादकता अवस्था अवस्था ऋणात्मक

द्वारा निरूपण ( représentation graphique):

5 है।

Étapes à suivre ( Stages)

अवस्था : बढ़ते प्रतिफल की अवस्था (première étape: étape du rendement croissant):

5 अवस्था ON मात्रा प्रदर्शित की गई है। के देखें (बिन्दु Q)। में

Utilisation optimale Utilisation optimale (Utilisation optimale) Utilisation intensive (Usage intensif)

Efficacité (Efficacité) स्थिर साधन साधन (indivisible) Ind। स्थिर

साधनों ही बढ़ते प्रतिफल (rendement croissant) जाता है। अवस्था में TV O से K दिखाया गया है। वक्र OK है।।

में , सकती है है:

O से बिन्दु F तक गमन:

बिन्दु में बिन्दु P ((बिन्दु F) सीमान्त उत्पादकता (MP) हुई है। बिन्दु O से बिन्दु F तक TP वक्र X-अक्ष के प्रति उन्नतोदर (Convex) है ।

बिन्दु F से बिन्दु K तक गमन:

कुल उत्पादन (TP) बढ़ता अवश्य है किन्तु घटती दर के साथ क्योंकि इस अन्तराल में सीमान्त उत्पादकता (MP) घटती तो है (देखें बिन्दु P से बिन्दु Q) किन्तु धनात्मक है । बिन्दु F से बिन्दु K के मध्य TP वक्र X-अक्ष के लिए अवनतोदर (Concave) है ।

जिस बिन्दु पर सीमान्त उत्पादकता अधिकतम होती है (देखें बिन्दु P) उस बिन्दु से सम्बन्धित कुल उत्पादन का बिन्दु (बिन्दु F) मोड़ का बिन्दु (Point of Inflation) कहलाता है । यही वह बिन्दु है जिसके बाद कुल उत्पादकता में वृद्धि घटती दर से होती है ।

द्वितीय अवस्था : घटते प्रतिफल की अवस्था ( Second Stage: Stage of Decreasing Return):

यह अवस्था चित्र में TP वक्र के बिन्दु K तथा बिन्दु T के मध्य प्रदर्शित की गई है । इस अवस्था में कुल उत्पादकता में वृद्धि तो अवश्य होती है किन्तु घटती दर से क्योंकि इस अवस्था में सीमान्त उत्पादकता और औसत उत्पादकता दोनों घटती हुई हैं । इस अवस्था का समापन उस बिन्दु पर होता है जहाँ सीमान्त उत्पादकता (MP) शून्य हो जाती है (देखें बिन्दु S) ।

जब सीमान्त उत्पादकता शून्य होती है तब कुल उत्पादकता (TP) अधिकतम होती है (देखें बिन्दु T) । यह अवस्था यह स्पष्ट करती है कि यदि परिवर्तनशील साधन की OS इकाइयाँ प्रयोग की जायें तो कुल उत्पादकता अधिकतम होगी । इस अवस्था के घटते प्रतिफल का कारण यह है कि अल्पकाल में स्थिर उत्पत्ति साधनों को बढ़ाया नहीं जा सकता ।

जब स्थिर साधनों पर परिवर्तनशील साधन की ON इकाइयों से अधिक का प्रयोग किया जाता है तो अति-विदोहन (Over-utilization) के कारण आन्तरिक हानियाँ (Internal Diseconomies) उत्पन्न होती हैं जिसके कारण सीमान्त उत्पादकता घटकर शून्य तक पहुँच जाती है ।

दूसरे शब्दों में, दी हुई स्थिर साधनों की मात्रा के साथ बढ़ती हुई परिवर्तनशील साधनों की मात्रा का प्रयोग परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता को घटा देता है । इस प्रकार स्थिर साधन एवं परिवर्तनशील साधन के संयोग अनुपात के असन्तुलित हो जाने के कारण घटते प्रतिफल उत्पन्न होते हैं ।

तृतीय अवस्था : ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था ( Third Stage : Stage of Negative Return):

इस अवस्था में बिन्दु T के बाद कुल उत्पादन घटना आरम्भ कर देता है क्योंकि बिन्दु T पर परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता शून्य है । यदि बिन्दु S के बाद परिवर्तनशील साधन की सीमान्त या एक अतिरिक्त इकाई का प्रयोग किया जाता है तो उस अतिरिक्त इकाई की सीमान्त उत्पादकता ऋणात्मक हो जाती है जिसके कारण कुल उत्पादकता वक्र घटना आरम्भ करदेता है ।

इसीलिए इस अवस्था को ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था कहा जाता है । इस अवस्था में परिवर्तनशील साधन स्थिर साधन की तुलना में अत्यधिक हो जाते हैं । यह असन्तुलित अनुपात परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता को ऋणात्मक बना देता है ।

किस अवस्था में उत्पादन कार्य लाभप्रद है ? (Under Which Stage Production Work is Advantageous?):

एक विवेकशील उत्पादक सदैव द्वितीय अवस्था में उत्पादन कार्य करना पसन्द करेगा । प्रथम अवस्था में जब परिवर्तनशील साधन की मात्रा को बढ़ाया जाता है तब कुल उत्पादकता में वृद्धि होती है क्योंकि अविभाज्य स्थिर साधनों का पूर्ण विदोहन हो जाता है ।

प्रथम अवस्था में ही यदि उत्पादक उत्पादन कार्य रोक देता है तो इसका अर्थ है कि वह उस अतिरिक्त लाभ से वंचित है जिसे वह परिवर्तनशील साधन की अतिरिक्त इकाइयाँ उत्पादन क्षेत्र में लगाकर प्राप्त कर सकता है ।

इस प्रकार उत्पादक के लिए लाभप्रद यह है कि वह परिवर्तनशील साधन की इकाइयों को उत्पादन क्षेत्र में तब तक बढ़ाता जाये जब तक उसे कुल उत्पादकता में तीव्र वृद्धि प्राप्त न हो । एक विवेकशील उत्पादक इस प्रकार परिवर्तनशील साधन की ON इकाइयों से कम का प्रयोग नहीं करेगा ।

परिवर्तनशील साधन की OS इकाई पर साधन की सीमान्त उत्पादकता शून्य तथा इसके बाद साधन की सीमान्त उत्पादकता ऋणात्मक हो जाती है जिसका अर्थ है कि इस तृतीय अवस्था में उत्पादक के लाभ में कमी होगी । अतः उत्पादक परिवर्तनशील साधन की OS इकाई से अधिक प्रयोग नहीं करेगा ।

केवल द्वितीय अवस्था-साधन की ON मात्रा से अधिक किन्तु OS मात्रा से कम-ही उत्पादन को सम्भव एवं लाभदायक बनाती है । द्वितीय अवस्था में साधन की सीमान्त उत्पादकता घट तो रही है किन्तु धनात्मक है जो कुल उत्पादकता में कुछ न कुछ वृद्धि अवश्य करेगी ।

घटती सीमान्त उत्पादकता उत्पादन के लिए खतरे की सूचना अवश्य देती है क्योंकि घटती सीमान्त उत्पादकता शून्य तक पहुँच कर तदुपरान्त ऋणात्मक भी हो जाती है । उत्पादक तीसरी अवस्था के आरम्भ होने के पहले ही अपने उत्पादन स्तर को नियन्त्रित करता है । इस प्रकार द्वितीय अवस्था ही उत्पादन कार्य योग्य है ।

उत्पत्ति ह्रास नियम की मान्यताएँ ( Assumptions of the Law of Diminishing Return):

(1) एक उत्पत्ति साधन परिवर्तनशील है तथा अन्य स्थिर ।

(2) परिवर्तनशील साधन की समस्त इकाइयाँ समरूप (Homogeneous) होती हैं ।

(3) तकनीकी स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता ।

(4) स्थिर साधन अविभाज्य (Indivisible) हैं ।

(5) विभिन्न उत्पत्ति साधन अपूर्ण स्थानापन्न (Imperfect Substitutes) होते हैं ।

(6) स्थिर साधन सीमित एवं दुर्लभ हैं ।

उत्पत्ति ह्रास नियम के लागू होने के कारण ( Causes of Operation of the Law of Diminishing Return):

आधुनिक अर्थशास्त्री उत्पत्ति ह्रास नियम के लागू होने के निम्न कारण मानते हैं:

1. एक या एक से अधिक साधनों का स्थिर होना (Fixity of one or more than one Factors of Production):

जब अन्य साधनों की मात्रा को स्थिर रखते हुए एक साधन (माना श्रम) की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि की जाती है तो परिवर्तनशील साधन श्रम का स्थिर साधनों के साथ अनुपात परिवर्तित होता चला जाता है ।

दूसरे शब्दों में, बढ़ती हुई श्रम मात्रा को स्थिर साधनों की ओर कम मात्रा के साथ काम करना पड़ता है । ऐसी दशा में श्रम की उत्पादकता कम होती चली जाती है और उत्पत्ति ह्रास नियम लागू हो जाता है ।

2. साधनों की अविभाज्यता (Indivisibility of Factors):

उत्पत्ति के अधिकांश साधन अविभाज्य होते हैं । ये अविभाज्य साधन अनुकूलतम बिन्दु की प्राप्ति तक तो उत्पादकता को बढ़ाते हैं किन्तु जब अनुकूलतम बन्दु की प्राप्ति के बाद भी साधनों का निरन्तर उपयोग जारी रहता है तब साधन की उत्पादकता घटने लगती है और उत्पत्ति ह्रास नियम लागू हो जाता है ।

3. उत्पत्ति के साधनों का पूर्ण स्थानापन्न न होना (Factors of Production are not Perfect Substitutes to each other):

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन साधनों की अपूर्ण स्थानापन्नता को उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता का मुख्य कारण मानती हैं । उनके अनुसार उत्पादन प्रक्रिया में एक साधन को दूसरे साधन के स्थान पर केवल एक सीमा तक ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है ।

उनके अनुसार उत्पत्ति के विभिन्न साधन परस्पर अपूर्ण स्थानापन्न होते हैं जिसके कारण सीमित साधन की कमी को किसी अन्य साधन से पूरा नहीं किया जा सकता । दूसरे शब्दों में, साधनों की स्थानापन्नता की लोच अनन्त नहीं होती जिसके कारण घटते प्रतिफल उत्पन्न होते हैं ।

4. साधनों की सीमितता (Scarcity of Factors):

कुछ उत्पत्ति के साधनों की पूर्ति स्थिर एवं सीमित होती है; जैसे – भूमि । अतः जब एक उत्पादक किसी साधन की पूर्ति को नहीं बढ़ा पाता तो उसे उस साधन की सीमित मात्रा से ही काम चलाना पड़ता है । परिणामस्वरूप सीमित साधन का अन्य परिवर्तनशील साधनों से प्रयोग अनुपात बदलता जाता है और उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील हो जाता है ।

उत्पत्ति ह्रास नियम का महत्व ( Importance of Law of Diminishing Return):

1. अर्थशास्त्र का आधारभूत नियम (Fundamental law of Economics):

यह नियम केवल कृषि पर ही लागू नहीं होता बल्कि खनन, मछली पालन, उद्योग, मकान निर्माण आदि सभी उत्पादन क्षेत्रों में क्रियाशील होने के कारण इस नियम का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है ।

घटते प्रतिफल की व्यावहारिकता को देखते हुए विकस्टीड (Wickstead) ने कहा है कि घटते प्रतिफल का नियम ”उतना ही सार्वभौमिक है जितना कि जीवन का नियम” (as Universal as the Law of Life and Death) ।

2. मॉल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त का आधार (Basis of Malthusian Population Theory):

मॉल्थस का सिद्धान्त यह बताता है कि देश में खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि जनसंख्या में वृद्धि से कम होती है । खाद्यान्नों में धीमी वृद्धि का कारण उत्पत्ति ह्रास नियम ही है ।

3. रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का आधार (Basis of Recardian Rent Theory):

रिकार्डों के गहरी खेती व विस्तृत खेती दोनों में लगान उत्पन्न होने का कारण उत्पत्ति ह्रास नियम है । गहरी खेती में जब दिये गये भू-खण्ड पर श्रम व पूँजी की अतिरिक्त इकाइयों का प्रयोग किया जाता है तो उत्तरोत्तर इकाइयों की उत्पादकता घटती जाती है क्योंकि उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है ।

सीमान्त इकाई की तुलना में पहले की इकाइयों को जो बचत प्राप्त होती है उसे रिकार्डों ने लगान कहा है । इस प्रकार यह लगान उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता का ही परिणाम है ।

4. सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त का आधार ( Basis of Marginal Productivity Theory):

इस सिद्धान्त में उत्पत्ति के साधनों को उनकी सीमान्त उत्पादकता के अनुसार पुरस्कार दिया जाता है । उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता के कारण परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता घटती हुई होती है ।

5. एक क्षेत्र के लोगों का जीवन-स्तर प्रभावित करता है (Affects Standard of Living of People Residing in an Area):

एक क्षेत्र में जनसंख्या उत्पत्ति के अन्य साधनों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती है तब वहाँ उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने के कारण उस क्षेत्र के लोगों का रहन-सहन स्तर गिर जायेगा ।

6. आविष्कारों एवं खोजों के लिए प्रेरणादायक (Incentive for Inventions):

उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता को स्थगित करने के लिए अनेक आविष्कार एवं खोज करने की प्रेरणा मिलती है ।

इस प्रकार उत्पत्ति ह्रास नियम सैद्धान्तिक (Theoretical) एवं व्यावहारिक (Practical) दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है ।

क्या उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता को स्थगित किया जा सकता है ? (Can the Working of the Diminishing Return Law of Be Postponed ?):

आधुनिक आविष्कारों के प्रयोग, वैज्ञानिक तकनीकी सुधार, कुशल प्रबन्धन एवं संगठन, कृषि मशीनीकरण, यातायात एवं संचार सुविधाओं में सुधार आदि अनेक घटकों के कारण उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता को कृषि उद्योग आदि क्षेत्रों में कुछ समय के लिए स्थगित किया जा सकता है किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि उत्पत्ति ह्रास नियम के क्रियान्वयन को टाला जा सकता है ।

वैज्ञानिक एवं आविष्कारों के युग में उत्पत्ति ह्रास नियम की प्रभावी प्रवृत्ति को कुछ समय तक ही स्थगित रखा जा सकता है, परन्तु उसे पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता ।

 

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